धर्मराज युधिष्ठिर काव्य हिंदी

महाभारत का में वो पृष्ठ हूं जिसे भुला यह समाज है धर्म अधर्म का बोध तुम्हें
आज कराता धर्मराज है सशरीर स्वर्ग मिला अडिग मेरा धर्म था शरीर स्वर्ग
मिला अडिग मेरा धर्म था रथ धरा पर न रहता था ऐसा उच्च कोटि का कर्म था
स्वार्थ से परे रहा न किसी लोभ में जिया स्वार्थ से परे रहा न किसी लोभ में जिया
विष मेरे अनुज को दिया यह कड़वा घूंट पी पिया अब धर्म की जो बात है तो धर्म ही
बताता हूं अब धर्म की जो बात है तो धर्म ही बताता हूं धर्म के विचित्र रूप का दर्शन
तुम्हें कर आता हूं धीयुत का खेल खेला तात श्री का मान था Dharmraj Yudhishthir Poetry Hindi

धीयुत का खेल खेला तात श्री का मान था पिता के बाद तात थे
पिता मेरे मित्र पितृ धर्म का मुझको ज्ञान था ना चाल की समझ थी रहा
धर्म के साथ सदा ना चाल की समझ थी

रहा धर्म के साथ सदा धीयुत ना छोड़ पाउ ऐसे वचन में में जा बंधा मामा श्री ने
कहा धीयुत का ये खेल खेलो सामने भाई तुम्हारे कौरव हैं वचन था दांव लगेगा
उस पर जो चीज तुम्हारा गौरव है राजपाट भी गया आधिपत्य रहा ना एक भी गांव
पर राज्य पाठ भी गया अधिपत्य रहा न एक भी गांव पर खेल नहीं वह प्रपंच था
भाई भी लगेगा दांव पे किसी एक धर्म की लाज रखता तो दूसरे पर संकट गहराया था

Dharmraj Yudhishthir Poetry Hindi | धर्मराज युधिष्ठिर | biggest Dharm Gyata

किसी एक धर्म की लाज रखता तो दूसरे पर संकट गहराया था शास्त्रों में यही पक्ष
धर्म संकट खेलाया था मामा शकुनि ने शब्दों में ऐसा मुझे उलझाया था धीयुत के भवर
से में निकल ही न पाया था धर्म संकट में डाल कर जीते थे कौरव मुझे धर्म संकट में डाल
कर जीते थे कौरव मुझे अरे दांव पर लगाए भाई क्योंकि उनपर राज्य से अधिक था
गौरव मुझे लगाया पांचाली को दांव पर मेरी आत्मा मुझसे क्रोध था लगाया पांचाली दांव
पर मेरी आत्मा को मुझसे क्रोध था पर कुल वधु का भी अपमान होगा मुझे न बोध था
किंतु धर्म अधर्म की तुला पकड़ने वाले होते हो कौन तुम धर्म अधर्म की तुला पकड़ने वाले
होते हो कौन तुम लेते द्रौपदी का पक्ष हो और बेटियों की हत्या पर रहते हो मौन तुम धर्म
की तो बात दूर विचित्र तुम्हारी न्याय प्रणाली है न्याय की कैसी विचित्र तुमने परिभाषा बना डाली है

निर्वस्त्र था में जगत में आया निर्वस्त्र था मैं जगत में आया सभी निर्वस्त्र जगत में आते हैं
फिर एक देव पुत्र को अपने जन्म से ही अभेद्य कवच कुंडल दे जाते हैं अब जरा मुझे तुम बता दो
न्याय का कौनसा अध्याय हैं मुझे प्रतीत होता है हर जातक पर में आए हैं कवच लेकर देवराज ने
किया हर योद्धा को समांथा कवच लेकर देवराज ने किया हर योद्धा को समांथा सूर्य देव के
पक्षपात का किया तुल्य समाधान था माता के तप से शरीर को वज्र बनाया यह केसा क्षत्रिय
धर्म है माता के तप से शरीर को वज्र बनाया यह केसा क्षत्रिय धर्म है Dharmraj Yudhishthir Poetry Hindi

धर्मराज युधिष्ठिर | biggest Dharm Gyata

साहस था तो खुद के सामर्थ्य से लड़ता यही सच्चे योद्धा का करम है दुर्योधन की जंघा थोड़ी
माता के तप से बज्र शरीर जब उसने पाया था धर्म विजय की खातिर माधव ने धर्म से
ज्यादा कर्म पर श्रेष्ट बताया था यही कर्म जो पहले समझ में जाता यही कर्म जो पहले
समझ में जाता कोमल हृदय पर घाव न लगता अरे धर्म से पहले कर्म को रखता
तो पांचाली दांव न लगता तो पांचाली दांव न लगता अरे नारी का ना सम्मान है करते
बूढ़े पिता को सदा ही यह सताते हैं यह विचित्र कलयुगी लोग हैं
माधव धर्मराज को धर्म सिखाते हैं धर्मराज को धर्म सिखाते हैं

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